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Snehdeep Osho Vision

 लाओत्से कहता है, परम श्रेष्ठता तो वह है, जो अनायास, जल के सदृश्य, उन स्थानों को खोज लेती है, जिन स्थानों में जाने के

लिए हम कभी भी राजी न हों, जिनकी हमारे मन में बड़ी निंदा है।

―जल की महानता हितैषणा में निहित है और उस विनम्रता में, जिसके कारण वह अनायास ऐसे निम्नतम स्थान ग्रहण करता है, जिनकी हम निंदा करते हैं। इसलिए तो जल का स्वभाव ताओ के निकट है।’

लाओत्से कहता है, ताओ का अर्थ है धर्म। ताओ का अर्थ है स्वभाव। ताओ का अर्थ है स्वरूप। जीवन का जो परम नियम है, उसका नाम है ताओ। लाओत्से कहता है, जल की यह ‍व्यवस्था ठीक ताओ के निकट है। ताओ को उपलब्ध ‍व्यक्ति भी इसी तरह, सर्वोत्कृष्ट ‍व्यक्ति भी इसी तरह नीेेचे, पीछे और दूर हट जाता है। छाया में, जहां उसे कोई देखे भी नहीं। भीड़ की अंतिम कतार में, जहां कोई 

संघर्ष न हो। और जब भी कोई वहां मौजूद हो, तब वह पीछे हटता चला जाता है।

दो तरह के लोग हैं: आगे बढ़ते हुए लोग और पीछे हटते हुए लोग। पीछे हटते हुए लोग कभी-कभी पैदा होते हैं। कभी कोई बुद्ध, 

कभी कोई लाओत्से, कभी कोई क्राइस्ट। आगे बढ़ते हुए लोगों की बड़ी भीड़ है।


"ओशो ताओ उपनिषद"


Lao Tzu says, the ultimate superiority is that which, spontaneously, like water, discovers the places to go.

 But we should never agree, which we have in our heart.

 The greatness of Aijal lies in good conduct and in that humility, because of which he involuntarily occupies the lowest position we condemn.  That is why the nature of water is close to the Tao. '

 Lao Tse says Tao means religion.  Tao means nature.  Tao means form.  The ultimate law of life is named Tao.  Lao Tzu says that this system of water is right near Tao.  The person available to the Tao likewise, the superior person likewise moves down, back and away.  In the shadow, where no one can see him.  In the last queue of the crowd

 Do not struggle.  And whenever someone is present there, he goes back.

 There are two types of people: people moving forward and people retreating.  Retracted people are sometimes born.  Sometimes some Buddha,

 Sometimes some Laotsay, sometimes some Christ.  There is a large crowd of people moving forward.


 "Osho Tao Upanishad"



Snehdeep Osho Vision

आज के युवा वर्ग को समर्पित 
ओशो युवक क्रांति दल बनाया था जो युवा जीवन के प्रति उत्साहित हो ,सभी मानसिक तनाव से मुक्त उत्सवपूर्ण जीवन जीने की कला से भरपूर ।
लेकिन आज का युवा अति महत्वकांक्षा ,से तनावग्रस्त होता जा रहा है ,जो चिंतनीय है ओशो ध्यान ही युवा को जीवन के प्रति क्रांतिकारी बना सकता है ।
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तुम आत्महत्या के बारे में क्यों सोचते हो?

मुझे पता है कि तुम जीवन से ऊब गये हो। यदि तुम सचमुच ऊब गये हो तो आत्महत्या नहीं करो, क्योंकि आत्महत्या तुम्हें फिर इसी जीवन में घसीट लायेगी -- और हो सकता है कि इससे भी अधिक भद्दा जीवन तुम्हें मिले, जैसा कि अभी तुम्हारा है; क्योंकि आत्महत्या तुम्हारे भीतर और भी अधिक गंदगी पैदा कर देगी।*

आत्महत्या करना अस्तित्व का अनादर है! अस्तित्व ने तुम्हें विकसित होने के लिये जीवन का अवसर दिया, और तुम इस अवसर को यूँ ही व्यर्थ गँवा देते हो।
और जब तक कि तुम विकसित नहीं होते और विकसित होकर बुद्ध नहीं बन जाते, तब तक तुम जीवन में बार-बार फेंके जाओगे। लाखों बार पहले भी यह हो चुका है -- अब समय है, अब जागो! इस अवसर को चूको मत!
*यहाँ मेरे साथ रहकर असली आत्महत्या की कला सीखो। असली कला में अपनी देह को नष्ट नहीं किया जाता है। देह सुंदर है, देह ने कुछ भी गलत नहीं किया है। यह तो मन है, जो असुंदर है। आत्मा भी सुंदर है, लेकिन देह और आत्मा के बीच कुछ है, जो न तो देह है, न ही आत्मा -- यह बीच की घटना ही मन है!*

यह मन ही है, जो तुम्हे बार-बार गर्भ में घसीट लाता है!
जब तुम मरते हो, यदि तुम आत्महत्या करते हो, तब तुम जीवन के बारे में ही सोच रहे होओगे। आत्महत्या करने का मतलब है कि तुम जीवन के बारे में सोच रहे हो। तुम ऊब चुके हो, जीवन से थक चुको हो, तुम पूरा अलग ही जीवन चाहते हो -- इसी कारण तुम आत्महत्या कर रहे हो, न कि तुम जीवन के खिलाफ हो। तुम सिर्फ 'इस' जीवन के खिलाफ हो।

हो सकता है कि जैसे तुम हो, वैसा तुम नहीं चाहते हो -- हो सकता है कि तुम सिकंदर, नेपोलियन या हिटलर बनना चाहते हो, हो सकता है कि तुम इस दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति बनना चाहते हो, और तुम हो नहीं! यह जीवन असफल हो गया, और तुम प्रसिद्ध होना चाहते थे, सफल होना चाहते थे -- अब इस जीवन को ही तुम नष्ट कर देना चाहते हो।

लोग आत्महत्या इसलिये नहीं करते हैं कि वे जीवन से सच में थक गये हैं, बल्कि इस कारण करते हैं क्योंकि यह जीवन उनकी मांगें पूरी नहीं कर रहा। लेकिन कभी भी किसी की मांगें जीवन पूरी नहीं करता है। तुम हमेशा कुछ न कुछ चूकते ही चले जाओगे। यदि तुम्हारे पास धन है, पर हो सकता है कि तुम सुंदर न हो। यदि तुम सुंदर हो, तो हो सकता है कि तुम बुद्धिमान न हो। यदि तुम बुद्धिमान हो, पर हो सकता है कि तुम्हारे पास धन न हो। और, हो सकता है कि कोई हर चीज पा ले, तब भी यह कैसे मदद करेगा? तुम अतृप्त रहोगे!

हर जीवन में यही बातें दोहराती जाती हैं, देह बदल जाती है, लेकिन दिशा वही रहती है!
लोग सोचते हैं कि जो आत्महत्या करते हैं, वे जीवन के खिलाफ हैं -- यह सत्य नहीं है। वे जीवन के प्रति बहुत अधिक लालसा रखते हैं, वे जीवन के लिए बहुत अधिक वासना रखते हैं। और चूँकि जीवन उनकी वासनायें पूरी नहीं करता, तो गुस्से में, तनाव, विषाद और हताशा में वे स्वयं को नष्ट कर लेते हैं।

मैं तुम्हें आत्महत्या का सही तरीका सिखाऊँगा। देह को नष्ट करके नहीं, देह तो अस्तित्व का सुंदरतम उपहार है! मन अस्तित्व का उपहार नहीं है, मन समाज से संस्कारित है। देह उपहार है, और आत्मा उपहार है -- और इन दोनों के बीच समाज तुम्हारे साथ तरकीब खेलता है; इसलिये समाज ने मन को बनाया। यह तुम्हें महत्वाकांक्षा देता है, यह तुम्हें ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, हिंसा देता है, यह तुम्हें हर तरह की गंदी बीमारियाँ देता है।

लेकिन इस मन का अतिक्रमण किया जा सकता है, मन को एक तरफ रखा जा सकता है। यह मन जरूरी नहीं है!
मैं तुम्हारे सामने बैठा हूँ, और अपने अनुभव से तुम्हें कह रहा हूँ, अपने अधिकार से कह रहा हूँ कि मन को एक तरफ रखा जा सकता है। यह बड़ा आसान है, तुम्हें बस इसका तरीका आना चाहिये।

और, आत्महत्या में मरना इतना पीड़ादायी है, क्योंकि यह प्राकृतिक बात नहीं है, यह सर्वाधिक अप्राकृतिक बात है। कभी भी कोई वृक्ष आत्महत्या नहीं करता -- सिर्फ आदमी करता है, क्योंकि सिर्फ आदमी इतना पागल हो सकता है!प्रकृति आत्महत्या के बारे में कुछ नहीं जानती, यह आदमी की खोज है! यह सबसे अधिक भद्दा और कुरूप कृत्य है। और जब कभी तुम स्वयं के साथ कोई बहुत ही भद्दी और कुरूप बात करते हो तो तुम आशा नहीं रख सकते कि तुम्हें आगे एक बेहतर जीवन मिलेगा। तुम मन की बेहद निकृष्ट दशा में मरोगे, और तुम बहुत ही निकृष्ट गर्भ में प्रवेश कर लोगे।

लेकिन आत्महत्या की जरूरत ही क्या है? जरा प्रश्न करो!
तुम निश्चित ही गलत ढंग से जीये हो, इसी कारण जीवन एक सुंदर गीत नहीं बना। तुम निश्चित ही मूर्खतापूर्ण ढंग से जीये हो, मूढ़तापूर्वक, अज्ञानी की तरह -- इसी कारण जीवन में उत्सव नहीं आया। तुम सितारों के साथ आनंद में नाच नहीं सकते, और न फूलों के साथ नाच सकते, और न हवाओं के साथ, न बरसात में मस्त होकर नाच सकते -- क्योंकि तुम गलत तरीके से जीये हो, जो तुम्हारे जैसे ही लोगों ने तुम्हारे ऊपर थोप दिये हैं।
यह सतत चलने वाली घटना है। मूढ़ता स्वतः सतत चलती रहती है। माता-पिता अपने बच्चों को अपनी मूढ़ता दिये चले जाते हैं, और यही बच्चे अपने बच्चों को वे सारी मूढ़तायें सौंप देते हैं। यह वंशानुगत विरासत है! इसे परम्परा कहते है, इसे विरासत कहते हैं, संस्कृति कहते हैं... बड़े-बड़े नाम हैं!

तुम जिस भांति अब तक जीते रहे हो, उस पर विचार करो, और तब तुम्हारे जीवन में एक नयी तरह की बुद्धिमत्ता आयेगी, और तुम्हारा जीवन अधिक प्रखर होगा।
अपने संस्कारों पर विचार करो। अब तक जैसे जीये हो, उस पर ध्यान दो -- कहीं बुनियादी रूप से कुछ गलत हुआ है।
पक्षी गीत गा रहे हैं, और वृक्ष, और फूल... यह अनंत अस्तित्व -- यह जगह आत्महत्या करने की है? इस जगह नृत्य करो, गीत गाओ, उत्सव मनाओ, प्रेम करो और प्रेम करने दो!
और यदि तुम इस अस्तित्व को प्रेम कर सकते हो, यदि तुम इस अस्तित्व के आशीर्वाद महसूस कर सकते हो, तो मैं तुमसे वादा करता हूँ कि जब कभी तुम मरोगे, तुम वापस लौटकर नहीं आओगे -- क्योंकि तुमने पाठ सीख लिया। अस्तित्व कभी किसी को फिर वापस नहीं भेजता यदि उसने जीवन का पथ सीख लिया हो।
यदि तुम आनंदित होना सीख लेते हो, तुम स्वीकार्य होओगे। तब उच्चतर रहस्य के लिये तुम्हारे द्वार खुल जायेंगे। तब जीवन के अंतरतम रहस्यों में तुम्हारा स्वागत होगा।
इसे ही मैं असली आत्महत्या कहता हूँ, और इसके लिये मैंने नाम रखा है ध्यान!

#ओशो:$$✍🏻
"बी सेटल एंड नो" प्रवचनमाला का एक अंश

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